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Saturday, 6 August 2011

-अश्वघोष
अभी तो लड़ना है तब तक
जब तक मायूस रहेंगे फूल
तितलियों को नहीं मिलेगा हक़
जब तक अपनी जड़ों में नहीं लौटेंगे पेड़
अभी तो लड़ना है तब तक
जब तक हलों को रोकती रहेंगी लाठियाँ
भूखा रहेगा हथौड़े का पेट
जब तक सीमाओं पर बहाल नहीं होगी शान्ति
अभी तो लड़ना है तब तक
जब तक आत्महत्या करती रहेगी शिक्षा
जेबों में सोता रहेगा रीतापन
जब तक आदमी को पीटता रहेगा वक़्त
अभी तो लड़ना है तब तक।

आज भी

-अश्वघोष

वक़्त ने बदली है सिर्फ़ तन की पोशाक
मन की ख़बरें तो आज भी छप रही हैं
पुरानी मशीन पर
आज भी मंदिरों में ही जा रहे हैं फूल
आज भी उंगलियों को बींध रहे हैं शूल
आज भी सड़कों पर जूते चटका रहा है भविष्य
आज भी खिड़कियों से दूर है रोशनी
आज भी पराजित है सत्य
आज भी प्यासी है उत्कंठा
आज भी दीवारों को दहला रही है छत
आज भी सीटियाँ मार रही है हवा
आज भी ज़िन्दगी पर नहीं है भरोसा।